Tuesday, April 28, 2015

Pretty much everything about Humankind in the past 4,000 years.
For world history, recorded history begins with the accounts of the ancient world around the 4th millennium BC, and coincides with the invention of writing. For some regions of the world, written history is limited to a relatively recent period in human history. Moreover, human cultures do not always record all information relevant to later historians, such as natural disasters or the names of individuals; thus, recorded history for particular types of information is limited based on the types of records kept. Because of these limits, recorded history in different contexts may refer to different periods of time depending on the historical topic
http://en.wikipedia.org/wiki/Recorded_history

Friday, March 6, 2015

श्री चित्रगुप्त भगवान की आरती

हे चित्रगुप्त भगवान आपकी जय हो |
हे धर्मराज के प्राण आपकी जय हो ||
रतिपति समरूप निधान आपकी जय हो,
हे सकल विश्व् के ज्ञान आपकी जय हो ||
हे विधि के विमल विधान आपकी जय हो,
हे विधना के वरदान आपकी जय हो ||
रच चुके सृष्टि जब ब्रम्हदेव ने देखा,
किस विधि होगा इस सकल विश्व् का लेखा ||
थे चिंता में मग्न सृष्टि के करता,
तब प्रगटे आप उन्ही से ये दुःख हर्ता ||
खोले दृग देखा विधि ने रूप मनोहर,
अपने ही ध्यान का चित्र सामने सुंदर ||
बोले हंसकर हे पुत्र मिटा दुःख मेरा,
रखना इस जग का लेख कर्म है तेरा ||
तू काया से उत्पन् हुआ है मेरे,
कायस्थ कहायेगे इससे सुत तेरे ||
जा देता हु वर होंगे वे यश भागी,
नितिघ्य चतुर ज्ञानी विद्या अनुरागी ||
यो ब्रम्हा से वरदान आपने पाया ,
देवों में भी मान आपने पाया ||
दो हमको भी वरदान आपकी जय हो,
रखना कुल गौरव मान आपकी जय हो ||
                 
                 रचयिता :- स्वः श्री लक्ष्मीनारायण माथुर
                 

Friday, November 14, 2014

लोकोक्तियाँ

1. सांगानेर को सांगो बाबो,   जैपर का हनमान
    आमेर की शीला देवी, लाइयो राजा मान

2. मात-पिता पीछ पूत, जात पीछ घोड़ो
    ना जाने तो थोड़ो थोड़ो

3.हींग न हळद, खा रे बलद

4. अड्डो ढड्डो, डोकरी के सर पड़ो...

5.घी सरावे खिचड़ी नाम बहु को होव

6. मन न मांगे,मुंड हिलावे

7. कुल्हाड़ी से कपडा धोवे, ठाकुर जी सहाय करजो

8. धूम धडाको सहनो, ई गांव में ही रहणो

9. हलडे, बलडे आवला घी शक्कर से खाये
    हाथी दबाये काख में, सौ कौस चल्यो जाए

10. पहली मंख्या महे ही आया, पाछे बड़ो भाई
      लौट पलेटा बाबो खाया, पाछे माहरी माई

11. आके माके आवन जावन, सीर करा छा खेती
       आकी सासु मारी सासु, लागे मां र बेटी

12. सासु की मैं सासु लागू, सुरसा की मैं माता
       सगा खसम की काई लागू, इको अर्थ बता जा

13. जाट जवाई भांजों, रेबारी सुनार
       कदे न होवे आपणो, कर देखो व्यवहार

14. पाद र हसे, बिको घर कदे ना बसे

15. झर झर झामरिया, तोड़या बैठ्या नाग
       बीच बैठा गाडरिया, सारा में सरदार

16.






 



Wednesday, November 12, 2014

हिन्दू मुस्लिम भाईचारा

सुलतान जलालुद्दीन का दरबार लगा हुआ है। वह एक उदार एवं न्यायप्रिय शासक है। उसकी सल्तनत में सबको पूरा न्याय मिलता है। अत: एक नौजवान माली अपनी
पत्नी की लाश लेकर न्याय की दुहाई देता हुआ दरबार प्रवेश करता है। उसकी पत्नी के
साथ बलात्कार हुआ है। सुलतान माली को आश्वासन देता है कि उसे न्याय मिलेगा। अपराधी भले ही कोई भी हो उसे कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाएगी। सुलतान अपराधी को
जाल में फाँसने के लिए शहर कोतवाल से एक गुप्त मंत्रणा करता है। कोतवाल
सुलतान से कहता है कि अपराधी पकड़ा जा सकता है किन्तु उसके खिलाफ कोई
ठोस सबूत चाहिए अत: सुलतान और शहर-कोतवाल मिलकर एक नकली चश्मदीद
गवाह तैयार करते हैं और जब शहर-कोतवाल उस नकली गश्ती सिपाही को सरे दरबार
पेश करता है तो एक तेज धार वाला चाक़ू नकली गश्ती सिपाही के वक्ष में आ घुसता
है।
     हमलावर तुरन्त पकड़ लिया जाता है जिसे देखकर सारे दरबारी आश्चर्यचकित
रह जाते हैं क्योकि हमलावर कोई और नहीं, क़ाज़ी मेहरुद्दीन का खास अंगरक्षक है।
जब सुलतान उसे सजा-ए-मौत का हुक्म सुनाता है तो वह घवरा जाता है और यह
स्वीकार करता है की उसने हमला काज़ी मेहरुद्दीन के कहने पर ही किया था।
दरबारी-गण काज़ी के बचाव में नारेबाजी करते हैं। इधर काज़ी के विरुद्ध कई अन्य
सबूत भी हाथ लगते हैं जिन्हें नज़र-अंदाज़ नहीं किया जा सकता है। सुलतान
काज़ी को बलात्कार करने और तत्पश्चात राज़ खुल जाने के भय से मालिन की
हत्या करने के अपराध में सरियत के अनुसार सज़ा-ए-मौत देता है जिसे सुनकर
काज़ी भय से काँप उठता है और अपना अपराध स्वीकार कर लेता है। काज़ी
सुलतान से रहम की भीख मांगता है। कुछ विद्द्वान एवं प्रतिष्ठित दरबारी-गण
भी काज़ी की सज़ा कम करने की सुलतान से विनती करते हैं।
     सुलतान जलालुद्दीन कहता है कि न्याय सबके लिए बराबर है। अगर मुद्दई
(मृतिका का पति ) चाहे तो सज़ा को कुछ कम किया जा सकता है। पूरी सज़ा
माफ़ करने का हक़ उसे भी नहीं है। माली सुलतान से विनती करता है कि काज़ी
को छोड़ दिया जाय। काज़ी को  मृत्यु दंड देने से उसकी मृत पत्नी तो वापस नहीं
आ जाएगी। तब सुलतान काज़ी के म्रत्यु दंड को निरस्त करके उसकी नंगी पीठ
पर पचास कोड़े लगाये जाने का हुक्म देता है और साथ ही उसे दिल्ली सल्तनत
से तुरंत बाहर निकल जाने का फ़रमान जारी कर देता है।
     जब काज़ी को दण्डित किया जा रहा है तब सुलतान का भतीजा अलाउद्दीन,
जो कड़ा-मानकपुर और अवध प्रान्तों का सूबेदार होने के साथ-साथ सुलतान का
दामाद भी है, दरबार में मौजूद होता है।वह सुलतान जलालुद्दीन का एक
विश्वासपात्र सिपहसालार भी है। काज़ी मेहरुद्दीन को राजाज्ञा के अनुसार तुरंत दिल्ली
छोड़कर जाना है। अत: वह उसी रात सूबेदार अलाउद्दीन के पास जा पहुँचता है और
उसे दिल्ली सुलतान जलालुद्दीन के खिलाफ भड़काता है। वह अलाउद्दीन को बताता है
कि उसके पिता मरहूम शिहाबुद्दीन मसूद खिलजी युद्ध भूमि में शहीद नहीं हुए
थे अपितु उनकी हत्या की गयी थी। हत्यारे का नाम पूछे जाने पर काज़ी सुलतान
जलालुद्दीन का नाम बताता है। आरम्भ में अलाउद्दीन को काज़ी की बात पर तनिक
भी विश्वास नहीं होता है किन्तु धूर्त और वाक्-निपुण काज़ी विभिन्न प्रकार के तर्क
प्रस्तुत करके अलाउद्दीन को अपने विश्वास में ले लेता है। परिणाम स्वरुप काज़ी
अलाउद्दीन को सिंहासनारूढ़ होने का लालच देकर सुलतान जलालुद्दीन की हत्या
करवाने पर राज़ी कर लेता है तत्पश्चात काज़ी मेहरुद्दीन एक षड्यंत्र रच कर अपने
कुछ वफादार सेनिकों से सुलतान जलालुद्दीन खिलज़ी की  हत्या करवा देता है।
     हत्या के बाद सुलतान जलालुद्दीन फ़िरोज़  खिलजी का सिर एक भाले की
नोक पर टांगकर कड़ा-मानकपुर तथा अवध प्रान्त की गलियों और सड़कों पर
घुमाया जाता है। इस लोमहर्षक एवं न्रशंस हत्याकांड से सारी सल्तनत में भय
और आतंक का साम्राज्य स्थापित हो जता है। मुल्तान में जब इस कांड की
सूचना मृतक सुलतान के ज्येष्ठ पुत्र अर्कली खान को मिलती है तो वह भय से
काँप उठता है। यहाँ तक कि जब उसकी विधवा माँ, मलिका-ए -जहाँ उसे
राज्याभिषेक के लिए दिल्ली बुलाती है तो वह वहां आने में असमर्थता प्रकट कर
देता है। इसीलिए विवश होकर मलिका -ए-जहाँ अपने द्वितीय पुत्र कद्र्खान को
रुकनुद्दीन इब्राहीम की उपाधि प्रदान कर उसे दिल्ली का सुलतान घोषित कर देती
है।
     उधर अलाउद्दीन अपने चाचा व स्वसुर सुलतान जलालुद्दीन फिरोज़ खिलजी
के सिर को भाले की नोक पर टाँगे सरेआम घुमाता हुआ अपनी विशाल सेना के
साथ तीव्र गति से दिल्ली की ओर बढ़ता आ रहा है। इसी बीच जब उसे अपने
साले कद्र खां के राज्या-भिषेक का समाचार मिलता है तो उसके सब्र का बांध टूट
जाता है और वह दिल्ली पहुँचने से पूर्व ही स्वयं को दिल्ली का सुलतान घोषित
कर देता है। दिल्ली के तख़्त-ओ-ताज के लिए एक भीषण गृह-युद्ध छिड़ने की
बढ़ती संभावनाओं से सारी प्रजा का दिल दहल उठता है।
     दिल्ली पहुंचकर अलाउद्दीन के सेनिक शाही महल को चारों ओर से घेर लेते
हैं। कद्र खां के अधिकाँश सेनिक और अमीर सरदार रातों-रात अलाउद्दीन से जा
मिलते हैं। आख़िर- कार बचाव का कोई चारा न देख कद्र खां अपने परिवार-जनों
के साथ महल के गुप्त-मार्ग से भाग निकलता है और अपने बड़े भाई अर्कली खां
की शरण में जा पहुँचता है। इस प्रकार दिल्ली साम्राज्य गृह-युद्ध की भीषण
विभीषिका में झुलसने से बाल-बाल बच जाता है और अलाउद्दीन को बिना
परिश्रम किये ही दिल्ली का तख़्त-ओ-ताज हाथ लग जाता है।
     24 अक्टूबर 1296 ईश्वी को दिल्ली स्थित गुलाम वंश के भूतपूर्व सुलतान
बलवन के लाल-महल में अलाउद्दीन खिलजी का राज्याभिषेक होता है जिसमे
दूर-वर्ती राज्यों के राजे-महाराजे भी सम्मिलित होते हैं। अलाउद्दीन सुलतान बनने
की ख़ुशी में राजा-महाराजाओं को उपहार भेंट करता है जिस कारण सुलतान
अलाउद्दीन व रण-थम्भोर के महाराजा हम्मीर देव के बीच कहा-सुनी भी होती है
और महाराजा हम्मीर देव रुष्ट होकर वहां से चले जाते हैं।
     इधर सुलतान की बेगम मेहरुन्निसा का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। दूर-
दूर से वैद्य-हकीम उसके उपचार हेतु आते हैं किन्तु किसी को भी उसका रोग
समझ में नहीं आता है। अंत में शाही हकीम कहता है कि बेगम को शारीरिक
रोग नहीं अपितु वह मानसिक रोग से ग्रस्त है। हकीम सलाह देता है कि उसे
कुछ दिनों के लिए किसी ऐसे स्थान पर इए जाया जाये जहाँ की आबो-हवा
बदली हुयी हो और बेगम स्वयं को कुछ हल्का महसूस करे। इससे उसके स्वास्थ्य
में सुधार आने की पूरी संभावना है।
     इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए शाही महल से 10-15कोस की दूरी पर जंगल
व यमुना नदी की मिली-जुली आबो-हवा में डेरे-तम्बू गाढ़ कर मेहरुन्निसा के
ठहरने की समुचित व्यवस्था कर दी जाती है। सखी-सहेलियों से लेकर दास-
दासियों तक सब-कुछ बदल दिया जाता है। अस्थाई महल के चारों-ओर सेनिकों
का कड़ा पहरा लगा दिया जाता है। बेगम का मन बहलाने के लिए आमोद-प्रमोद
के सारे साधन जुटा दिए जाते हैं। इस प्रकार सेनिकों की कड़ी बेगम मेहरुन्निसा
का सखियों व दासियों के साथ सुबह-शाम टहलने जाने का सिलसिला शुरू हो
जाता है।
      सुलतान ने राज-काज में अधिक व्यस्तता के कारण इस कार्य का दायित्व
काज़ी मेहरुद्दीन को सौंप रखा है। इससे काज़ी मन ही मन बहुत खुश है। वह धूर्त,
कामी-दरिंदा आरम्भ से ही मेहरुन्निसा के सौन्दर्य पर लट्टू है। अलाउद्दीन का
विश्वास जीत कर उसने एक तीरसे दो शिकार किये हैं। पहला शिकार उसने अपने
कट्टर शत्रु सुलतान जलालुद्दीन का किया है और दूसरा शिकार अब वह निष्छल
मेहरुन्निसा का करने जा रहा है। इस कुकृत्य की पूर्ति के लिए उसने अपनी इस
व्यवस्था में हर स्थान पर अपने ही आदमी नियुक्त कर रखे हैं। सेनिक, बेगम की
सखियाँ, दास-दासियाँ यहाँ तक की रसोइये भी उसके अपने विश्वास-पात्र व्यक्ति हैं।
      और एक रात इसी बात का लाभ उठाकर धूर्त काज़ी बेगम मेहरुन्निसा
के कक्ष में दाखिल हो जाता है। सोई हुयी मेहरुन्निसा काज़ी के स्पर्श से हड़बड़ाकर
उठ बैठती है। उसके पलंग पर क़ाज़ी की उपस्थिति उसे आश्चर्य में डाल देती है।
अपनी स्थिति को सम्हालते हुए वह क़ाज़ी को फटकारती है किन्तु काज़ी उसे
धमकाते हुए कहता है अब उसकी सहायता के लिए वहां कोई नहीं आएगा।
अच्छा होगा कि वह काज़ी के आगे समर्पण कर दे। बेगम मेहरुन्निसा सुलतान
से कह कर उसे फांसी पर लटकवा देने की धमकी देती है इस पर काज़ी हंसी
के ठहाके लगाते हुए कहता है कि वह सुलतान से शिकायत तब ही करेगी जब
वह वहां से जीवित बच कर जाएगी। अगर वह स्वेच्छा से स्वयं को काज़ी के
हवाले नहीं करेगी तो काज़ी बलात्कार के बाद उसकी हत्या करके यमुना में फ़ेंक
देगा।
     अपने बचाव का अवसर तलाशती मेहरुन्निसा काज़ी की कमर में लटका
खंजर झपट लेती है और उसकी गर्दन पर वार करती है। किसी प्रकार उसका निशाना
चूक जाता है और खंजर काज़ी के मुंह में घुस जाता है जो उसके गाल को चीरता
हुआ उस पार निकल जाता है। काज़ी जोरों से चीखता है और जब तक सेनिक
कक्ष में दाखिल होते हैं, मेहरुन्निसा वहां से भाग निकलने में सफल हो जाती है।
     काजी के आदेश पर सेनिक उसका पीछा करते हैं किन्तु मेहरुन्निसा झाड़ियों
की ओट में छिपती-छिपाती यमुना-नदी के तट पर पहुँच जाती है। रात अँधेरी है।
सेनिक मशाल की रौशनी में मेहरुन्निसा को चारों ओर खोजते हैं। अचानक एक
सेनिक की दृष्टि उस पर पड़ती है और वे लोग उसे पकड़ पाते इससे पूर्व ही वह
उफनती यमुना-नदी में कूद पड़ती है। सेनिक नदी में कूद कर उसे पकड़ पाने का
साहस नहीं कर पाते और खाली-हाथों काज़ी के पास लौट आते हैं। सेनिक लोग
मेहरुन्निसा का दुपट्टा, जो यमुना में कूदते समय झाड़ियों में उलझ गया था,
काजी को दिखाते हुए उससे कहते हैं कि कुछ राजपूत-सेनिक उधर से गुजर रहे
थे इसलिए उन्होंने मेहरुन्निसा की हत्या करके उसके शव को यमुना में फेंक
दिया। सबूत के लिए बेगम का दुपट्टा वे लोग ले आये हैं। काजी राहत की सांस
लेता है किन्तु वह सुलतान को विश्वास दिलाने के लिए एक योजना तैयार करने
लगता है।
     उधर यमुना में कूदते समय मेहरुन्निसा लकड़ी के एक मोटे से लट्ठे पर
जा गिरती है जो जल के तीव्र प्रवाह में बहता जा रहा है। वह किसी प्रकार स्वयं
को नियंत्रित करके लट्ठे से चिपटी रहती है। लट्ठा बहता हुआ आगरा जा पहुंचता
है जहाँ रण-थम्भोर के महाराजा हम्मीर देव नदी में स्नान कर रहे हैं। जब उनकी
दृष्टि लट्ठे पर मूर्छित पड़ी मेहरुन्निसा पर पड़ती है तो वे सेनिकों को उसे बाहर
निकालने का आदेश देते हैं और यमुना के किनारे बने अपने शिविर में ले आते
हैं। जब मेहरुन्निसा को होश आता है तो वह अपने सामने महाराजा हम्मीर देव
को देख कर चौक पड़ती है। हम्मीर देव भी मेहरुन्निसा को पहचान जाते हैं क्योंकि
इससे पूर्व भी वे दोनों सुलतान अलाउद्दीन के राज्याभिषेक के अवसर पर एक-दुसरे
को देख चुके होते हैं परन्तु दोनों ही एक-दुसरे को इसका आभास तक नहीं होने
देते हैं।
     हम्मीर देव जब मेहरुन्निसा से पूछते हैं कि वह कौन है, कैसे वह यमुना में
गिरी ? तो मेहरुन्निसा स्वयं के वारे में कुछ भी बताने से इंकार कर देती है।
वह हम्मीर देव के पैरों में गिर कर कहती है कि वे उससे भविष्य में भी कभी कुछ
न पूछें। यदि वे उस पर उपकार ही करना चाहते हैं तो उसे अपने यहाँ दासी की
जगह दे दें। हम्मीर देव मेहरुन्निसा को अपने पैरों से उठाकर हृदय से लगाते हुए
कहते हैं कि वह अब उनकी बहिन है और बहिन को राजपूत लोग अपने चरणों में
नहीं मस्तक पर स्थान देते हैं। वे मेहरुन्निसा को अपने साथ रण-थम्भोर ले आते
हैं और अपने परिवार के बीच उसे अपनी बहिन की भांति रखते हैं। महल में
मेहरुन्निसा को अपनी सारी दिन-चर्या इस्लामी तौर-तरीके से करने की पूरी स्वतंत्रता
है।
     इधर काज़ी रोता-चिल्लाता अपने सेनिकों के साथ सुलतान अलाउद्दीन के दरबार
में प्रविष्ट होता है और बेगम मेहरुन्निसा की हत्या किये जाने की मन-गढ़ंत कहानी सुलतान को सुनाता है जिसके अनुसार कुछ नक़ाबपोश घुडसवार शिविर में घुस आये
और बेगम आलिया को उठाकर भाग निकले। शाही-सिपाहियों ने उनका डटकर मुकाबला किया किन्तु वे लोग जाते-जाते बेगम को क़त्ल करके यमुना में फैंक गए।
इस मुठभेड़ में कई शाही-सेनिक घायल हो गए और काज़ी स्वयं भी घायल हो गया।
काज़ी अपना कटा हुआ गाल और जबड़ा सुलतान को दिखाता है। वह सुलतान से
कहता है कि बेगम के शव को यमुना में काफ़ी तलाशा गया परन्तु शिवाय उसके
दुपट्टे के, जो झाड़ियों में उलझ गया था, कहीं कुछ हाथ नहीं लगा।
     सारा ब्रतांत सुनकर सुलतान अलाउद्दीन क्रोध से पागल हो जाता है और चक्कर
खाकर सिंहासन पर ही ढेर हो जाता है। सारे दरबारी-गण उसकी ओर दौड़ पड़ते हैं।
कुछ समय बाद जब सुलतान को होश आता है तो वह शाही हकीम से चिपट कर
रोने लगता है और उससे पूछता है कि क्या उसने इसीलिए बेगम की आबो-हवा
बदलने की सलाह दी थी। शाही हकीम सुलतान को धैर्य बंधाते हुए कहता है कि
वक्त के आगे किसी का जोर नहीं चलता। सुलतान काज़ी से कहता है, कौन ऐसा
दुश्मन हो सकता है जिसने उससे उसकी जिन्दगी छीन ली। मेहरुन्निसा उसकी
जिन्दगी थी। इस पर काज़ी कहता है कि ऐसा दुष्साहस तो केवल हम्मीर देव ही
कर सकता है। किसी अन्य में इतना साहस कहाँ जो दिल्ली-सुलतान से टकराने
की सोच भी सके। अलाउद्दीन एक पल को काज़ी की बात पर गौर करता है फिर
कहता है, हम्मीर इतनी गिरी हुयी हरकत कभी नहीं कर सकता है ! काज़ी मेहरुद्दीन
के साथ यह पहली बार हुआ है, जब सुलतान अलाउद्दीन ने उसकी बात पर
असहमति प्रकट की है।
     इसी बीच एक सिपाही दरबार में आकर सुलतान को बताता है कि राजधानी
के शिव-मंदिर पर हिन्दुओं ने कब्ज़ा कर लिया है। उन्होंने पहरे के सारे मुसलमान
सिपाहियों का क़त्ल कर दिया है। यह समाचार सुनकर सुलतान और भी क्रुद्ध हो
उठता है और सिपह- सालार उलुघ खां को आदेश देता है कि हिन्दुओं के उस मंदिर
को मस्जिद का जामा पहना कर उसे जामा-मस्जिद बना दिया जाये और सारी
मूर्तियों को तोड़ कर उन्हें खाक़ में मिला दिया जाये। साथ ही सारे बागी हिन्दुओं
को गिरफ़्तार करके उनके सर कलम कर दिए जायें और उन कटे हुए सरों को उस
मार्ग पर दूरों तक बिछा दिया जाए जिस रास्ते से फ़ौजी सिपाही जिहाद के लिए
रवाना होने वाले हैं। उलुघखां सुलतान के आदेश के पालन के लिए तुरंत मंदिर की
ओर प्रस्थान करता है और वहां पहुँच कर पूजा-अर्चना करते श्रद्धालुओं को बंदी बना
लेता है। उलुघखां बंदी हिन्दुओं को अपने सहायक अलपखां की निगरानी में छोड़ कर
मंदिर के पुजारी पंडित रामदास की खोजमें निकल पड़ता है।
     पुजारी रामदास अपनी छोटी बच्ची को सीने से चिपटाए अपने मित्र हाज़ी
पीरबख्श के यहाँ पहुँचता है। रामदास उसकी सहायता से दिल्ली-सल्तनत के बाहर
निकल जाने में सफल तो हो जाता है किन्तु इस प्रकरण में हाज़ी पीरबख्श अपने
प्राण गवां बैठता है। उसका पुत्र नूरबख्श उर्फ़ नूरा पुजारी रामदास के साथ हो लेता
है। इस प्रकार वे लोग दिल्ली सल्तनत की सरहद पार करके रण-थम्भोर की सीमा
में पहुँच जाते हैं जहाँ उन्हें जंगली कबीले के सरदार की शरण मिल जाती है। बहुत
प्रयास के बाद भी जब पुजारी रामदास उलुघ खां के हाथ नहीं आता तो वह निराश
होकर मंदिर की ओर वापस लौट पड़ता है।
     इधर उलुघखां के जाने के बाद अलपखां पुजारी रामदास की बेटी रूपा के साथ
बलात्कार कर डालता है जो बलात्कार से पूर्व ही मर चुकी होती है। पुजारी रामदास
का बारह वर्षीय पुत्र कृष्णा चीख-चीख कर अपनी बहिन को बचाने की भगवान शिव
से प्रार्थना करता है किन्तु उसकी बहिन रूपा दरिन्दे अलप खां के उत्पीडन की शिकार
हो ही जाती है। जब उलुघ खां मंदिर में वापस लौटता है तो उसे चारों-ओर बंदी-जनों
के रुण्ड-मुण्ड पानी में तैरते नजर आते है। वह सिपाहियों को कटे हुए सिरों को
टोकरों में भरने का हुक्म देता है और पुजारी की पत्नी व बच्चों के वारे में पूछता है।
अलप खां बताता है कि पुजारी की बेटी ने मंदिर में घुस कर आत्म-हत्या कर ली
और उसकी पत्नी ने मंदिर के थम्ब पर सिर पटक-पटक कर कर अपनी जान दे दी।
पुजारी का बेटा बेहोश पड़ा है। उलुघखां उसे होश में लाये का आदेश देता है।
     कृष्णा को जब होश आता  है तो वह मंदिर की ओर भागता है और भगवान
शिव की मूर्ति का अपमान करता है।  कृष्णा अपनी बहिन के खून को अंजुली में
लेकर सपथ लेता है कि जब तक शिव को भगवान मान कर पूजने वाला एक भी
व्यक्ति इस पृथ्वी पर बाक़ी है वह चैन से नहीं बैठेगा। वह शिव का अस्तित्व मिटा
कर ही रहेगा। कृष्णा के इस प्रण को सुनकर सारे यवन सिपाही  ठहाके लगा कर
हँसते हैं। कृष्णा को जब सुलतान अलाउद्दीन के आगे पेश किया जाता है तो वह
उसके आगे भी अपनी की हुयी प्रतिज्ञा दोहराता है जिस पर अलाउद्दीन मन ही
मन खुश होता है और उसे अपने संरक्षण में रख  कर युद्ध-कला में निपुण होने
की शिक्षा दिलवाता है। बालक कृष्णा के मन में हिन्दू देवी-देवताओं के प्रति आक्रोश
तो शिव-मंदिर में हुए हत्या-कांड वाले दिन से ही है किन्तु सुलतान अलाउद्दीन का
सामीप्य पाकर वह दिन प्रति दिन कठोर होता जाता है। अलाउद्दीन को भी अपनी
हिन्दू प्रजा के दमन हेतु कृष्णा के रूप में एक तेज धार वाला हथियार मिल जाता
है।
     इधर सुलतान अलाउद्दीन का विशेष सलाहकार क़ाज़ी मेहरुद्दीन गंभीर रूप से
बीमार है। उसके गाल और जबड़े में सड़न पैदा हो गयी है और वह सड़न गले
तक पहुँच गयी है। क़ाज़ी कुछ भी निगल पाने में असमर्थ है। सुलतान अलाउद्दीन
व शाही हकीम सहित बहुत सारे लोग उसके पास खड़े हैं। सब लोग उसे पानी
पिलाने की कोशिश करते हैं किन्तु क़ाज़ी दो घूंट पानी के लिए तड़प रहा है।
सुलतान जलालुद्दीन के शब्द उसके कानों में गूंज रहे हैं- "बदजात क़ाज़ी, तेरे
मरते वक्त तेरे पास पानी भी होगा और पिलाने वाले भी तेरे पास खड़े होंगे।
तुझे प्यास भी बहुत तेज लगी होगी मगर तू पानी का एक घूंट भी गले के
नीचे नहीं उतार पायेगा। मेरे ये अल्फाज़ याद रखना।" क़ाज़ी जोरों से चीख पड़ता
है और कहता है-"सुलतान जलालुद्दीन, खुदा के वास्ते अपने अल्फाज़ वापस ले ले
... मुझे सिर्फ दो घूंट पानी पी लेने दे।" और अंत में क़ाज़ी मेहरुद्दीन पानी के
लिए तड़प-तड़प कर अपना दम तोड़ देता है।
   उधर राजा हम्मीर देव के महल में मेहरुन्निसा एक सुन्दर सी कन्या को जन्म
देती है जिसका नाम गुलबदन रखा जाता है। हम्मीर-देव के राज्य रण-थम्भौर में
खुशियों का आलम छा जाता है। राजा हम्मीर-देव गुलबदन को बहुत प्यार करते हैं
और उसके लिए महल में वे सारी सुविधाएं जुटाते देते हैं जैसे उसे अपने पिता के
महल में उपलब्ध होतीं। गुलबदन बड़ी होती जाती है जिसकी शिक्षा-दीक्षा का पूरा
प्रबंध इस्लामी तौर-तरीके से महल में ही कर दिया जाता है। पास के मुस्लिम राज्य
से विद्वान मौलबियों को बुलाकर उनके रहने आदि का सारा प्रबंध भी रण-थम्भौर में
ही कर दिया जाता है। और फिर शहजादी गुलबदन को उचित ढंग से इस्लामी शिक्षा
दी जाने लगती है। गुलबदन बचपन से ही महाराजा हम्मीर-देव को मामाश्री कहकर
संबोधित करती है। युद्ध-कला में निपुण बनाने के लिए हम्मीर-देव स्वयं उसे तलवार
चलाने का प्रशिक्षण देते हैं।
    क़ाज़ी की मृत्यु के उपरान्त सुलतान अलाउद्दीन कृष्णा के व्यस्क होने पर उसे
मलिक- काफूर की पदवी प्रदान कर अपना विशेष सलाहकार और सेना अध्यक्ष
नियुक्त करता है और यही मलिक काफूर कालान्तर में एक दरिन्दे के रूप में उभर
कर हिन्दू प्रजा के सामने आता है। यह दरिंदा आये दिन देवी-देवताओं के मंदिर
ध्वस्त करता है,  मूर्तियाँ तोड़ कर आम-रास्तों पर फिंकवा देता है और हिन्दू -प्रजा
पर नाना-प्रकार के अत्याचार करता है।
     उधर कबीले के सरदार के संरक्षण में रह रहे पुजारी रामदास की बेटी दुर्गा व
उसके मित्र हाज़ी पीरबख्श का पुत्र नूरा भी अब बड़े हो चुके हैं। नूरा अपने पिता के
मित्र पुजारी रामदास की सेवा-सुश्रुषा और छोटी बहिन दुर्गा की रक्षा में तन-मन से
तत्पर है। कबीले के सभी लोग उसे बहुत प्यार करते हैं। नूरा भी अपनी हर ख़ुशी
उन लोगों में बांटता है और हर जरूरत में उनके काम आता है। कबीले का सरदार
खड़ग सिंह नूरा को भाला चलाने में और दुर्गा को तीरंदाजी में निपुण कर देता है।
उसका अपना पुत्र भीमा मल्ल-युद्ध में दक्ष है। इन तीनों कुशल योद्धाओं का सामना
कई बार मलिक-काफूर से हो चुका है और हर बार मलिक काफूर को ही मुंह की
खानी पड़ती है।
    सुलतान अलाउद्दीन एक विशेष प्रतियोगिता आयोजन करता है जिसमे समूचे
भारत वर्ष के प्रतियोगी भाग लेने को आमंत्रित किये जाते हैं। इसकी सूचना जब
गुलबदन के कानों में पड़ती है तो वह अपने मामाश्री हम्मीर-देव से प्रतियोगिता
में भाग लेने की इच्छा प्रकट करती है। बहुत सोचा-विचारी के बाद हम्मीर-देव उसे
इस प्रतियोगिता में भाग लेने की अनुमति प्रदान कर देते हैं। उस ओर नूरा, भीमा
और दुर्गा भी इस प्रतियोगिता में भाग लेने पहुँचते हैं। प्रतियोगिता के मैदान में
सुलतान एक ऊँचे से मंच पर विराजमान है। इस प्रतियोगिता में दूर-दूर के राज्यों
से प्रतियोगी आये हुए हैं। महाराजा हम्मीर-देव को आया देखकर नूरा, भीमा और
दुर्गा भी उनसे आशीर्वाद लेने आ पहुँचते हैं। जब हम्मीर-देव को उन तीनों का
परिचय प्राप्त होता है तो उन्हें हार्दिक प्रसन्नता होती है और वह उन्हें ' विजयी-
भव' कह कर आशीर्वाद प्रदान करते हैं।
     प्रतियोगिता आरम्भ होती है। सुलतान के संकेत पर दिल्ली-सल्तनत का
कोई एक उच्च-पदाधिकारी हरी झंडी दिखाकर सीटी बजाता है और प्रथम राउंड
में दौड़-प्रतियोगिता का शुभारम्भ होता है। इसके बाद क्रमश:मल्ल-युद्ध, तीरंदाजी
तथा भाला-फैंक आदि प्रतियोगिताएं आरम्भ होती हैं। जिनमे तीनो विजेता रण-
थम्भौर राज्य के निवासी ही होते हैं। मल्ल-युद्ध में भीमा, तीरंदाजी में दुर्गा और
भाल-फैंक प्रतियोगिता में नूरा विजयी होते हैं। और अंतिम प्रतियोगिता होती है
तलवार बाज़ी की, जिसमे गुलबदन भाग लेती है। 'गुलबदन' का परिचय कुंवर
गजेन्द्र देव के रूप कराया जाता है जहाँ गुलबदन ने मर्दानी भेष-भूषा धारण की
हुयी होती है और उसे महाराजा हम्मीर-देव का भानजा बताया गया है। गुलबदन
का मुकाबला होता है मलिक-काफूर से। आरम्भ में मलिक-काफूर तलवार-बाज़ी के
कई पैतरे बदल-बदल कर दर्शकों को प्रभावित करता है किन्तु अंत में गुलबदन
का ही पलड़ा भारी पड़ता है और उसे गुलबदन के आगे घुटने टेकने पड़ते हैं।
समस्त सैनिकों के आगे पराजय का मुंह देखकर मलिक-काफूर शर्म के कारण
किसी से निगाहें नहीं मिला पाता और खेल के मैदान से चला जाता है।
      इधर सुलतान अलाउद्दीन कुंवर गजेन्द्र-देव का रूप धारण किये हुए
'गुलबदन' को अपने हाथों से 'शमशेर-बहादुर' का खिताब प्रदान करता है।
मलिक-काफूर अपने इस अपमान को भूल नहीं पाता और वह गुलबदन के
पीछे अपने जासूसों को छोड़ देता है। जासूसों द्वारा मलिक-काफूर को ज्ञात होता
है कि  कुंवर गजेन्द्र-देव कोई और नहीं बल्कि एक मुस्लिम लड़की 'गुलबदन' है
जिसका पालन-पोषण हम्मीर-देव ने अपनी भान्जी मान कर किया है
     इस बात का फायदा उठाते हुए मालिक-काफूर सुलतान अलाउद्दीन के आगे
गुलबदन के रूप-सौन्दर्य की चर्चा करता है और कहता है कि उसे तो दिल्ली-
सुलतान की मलिका-ए-जहां होना चाहिए था। गुलबदन एक मुस्लिम युवती है,
पता नहीं हम्मीर-देव उसे कहाँ से उठा लाया है। शुरू में तो अलाउद्दीन राज़ी नहीं
होता है किन्तु बाद में वह गुलबदन को पाने के लिए लालायित हो उठता है।
सुलतान अलाउद्दीन हम्मीर-देव के पास एक पैगाम भेजता है जिसमें वह गुलबदन
की मांग करता है और ऐसा न करने पर वह युद्ध के लिए तैयार रहने की धमकी
देता है।
     महाराजा हम्मीर-देव उसकी चेतावनी पर युद्ध के लिए तैयार हो जाते हैं।
और जब मलिक-काफूर के नेतृत्व में सुलतान अलाउद्दीन एक सेना भेजता है तो
हम्मीर-देव के सेनिक उसे परास्त करके वापस लौटा देते हैं। सुलतान अलाउद्दीन
बहुत क्रोधित होता है और एक विशाल सेना लेकर युद्ध के लिए स्वयं रण- थम्भोर
जा पहुँचता है। सूचना मिलते ही हम्मीर-देव भी मैदान में आ डटते हैं। वह
अलाउद्दीन को सलाह देते हैं कि युद्ध उन दोनों के बीच हो तो हार-जीत का फैसला
हो जाएगा। अकारण सेनिकों को युद्ध की अग्नि में क्यों  झोका जाए। इस बात
पर सुलतान अलाउद्दीन भी राज़ी हो जाता है और दोनों योद्धाओं की तलवारें खन-खना
उठती हैं।
     गुलबदन की एक मूर्ति बनाकर युद्ध-स्थल में रख दी जाती है और उससे सौ-
सौ फीट की दूरी पर दोनों योद्धा खड़े हो जाते हैं। शर्त यह होती है कि यदि सुलतान
अलाउद्दीन गुलबदन की मूर्ति को निरावृत कर देता है तो गुलबदन उसे दे दी जाएगी
अन्यथा उसे हार स्वीकार करके वापस जाना होगा। अलाउद्दीन कहता है कि वह हार
कर लौटने से युद्ध-स्थल में मर जाना कहीं बेहतर समझेगा। हम्मीर-देव भी प्रण
करते हैं कि अगर अलाउद्दीन ने उसकी भान्जी को निरावृत कर दिया तो उनकी
तलवार उनकी ही गर्दन पर होगी। उनकी मृत्यु के पश्चात ही कोई गुलबदन को ले
जा सकता है। इस प्रकार दोनों योधाओ के बीच घमासान युद्ध होता है और कई
दिनों तक युद्ध जारी रहता है।
     जब इस युद्ध की सूचना बेगम मेहरुन्निसा को मिलती है तो वह युद्ध-स्थल
पर आ पहुँचती है। इस समय हम्मीर-देव की तलवार का वार अलाउद्दीन की गर्दन
पर होने ही वाला होता है कि मेहरुन्निसा बीच में आकर हम्मीर-देव की तलवार
वाली भुजा पकड़ लेती है और अपने पति अलाउद्दीन को मरने से बचा लेती है।
इसी बीच अलाउद्दीन भागकर गुलबदन की मूर्ति को निरावृत कर देता है और
जोरों के ठहाके लगाता हुआ हम्मीर-देव से कहता है - "देख हम्मीर देख ! हमने
तेरी गुलबदन को बेपर्दा कर दिया। शर्त के मुताबिक़ अब गुलबदन हमारी हुयी।
तू भी अब अपना कौल याद कर और अपनी तलवार से अपनी गर्दन काट कर
अपने वचन को पूरा कर।"
     अलाउद्दीन का उलाहना सुनकर हम्मीर-देव की तलवार हवा में लहरा उठती है
तभी महरुन्निसा उसका हाथ पकड़ लेती है और अलाउद्दीन को संबोधित करती
हुयी कहती है - "मेरे सरताज, गुलबदन तो तब भी आपकी ही थी और अब भी
आपकी है। गुलबदन आपकी बेटी है !" अलाउद्दीन पत्नी की ओर देखता रह जाता
है। और फिर एकाएक चिल्ला उठता है -"निशा ... निशा, तुम जिन्दा हो!" "हाँ मैं
जिन्दा हूँ ! और गुलबदन आपकी ही बेटी है जिसे आप ..."   "नहीं निशा, तुम्हें
ख़ुदा का वास्ता, आगे एक लफ्ज़ भी ना बोलना।"  सुलतान आगे बढ़ कर
मेहरुन्निसा के मुंह पर हाथ रख देता है। और हम्मीर-देव के आगे झुक कर
उससे मांफी मांगता है। हम्मीर-देव सुलतान को उठा कर अपने हृदय से लगा
लेते हैं।
      मेहरुन्निसा महाराजा हम्मीर-देव को बताती है कि अलाउद्दीन ही उसका
पति और गुलबदन का पिता है इस पर हम्मीर-देव कहते हैं कि वह इस बात
को जानते थे। इस पर मेहरुन्निसा आश्चर्य से कहती है कि यह सब जानते हुए
भी उन्होंने शत्रु की पत्नी को बहिन मान कर अपने महल में पनाह दी। हम्मीर-
देव कहते हैं कि स्त्री किसी की भी हो सम्मान के योग्य होती है। अत: उन्होंने
उसे बहिन का स्थान देकर उस पर कोई एहसान नहीं किया, बल्कि जो
मानवोचित था वही किया।
     हम्मीर-देव घोषणा करते हैं कि दिल्ली-सुलतान अलाउद्दीन के स्वागत में
आज की रात जश्न मनाया जाये। कल वह अपनी बहिन मेहरुन्निसा और
भान्जी गुलबदन को विदा करेंगे। अलाउद्दीन अपनी सेना को दिल्ली के लिए
रवाना कर देता है और अपने कुछ सेनिकों व अंग-रक्षकों के साथ हम्मीर-देव
का निमंत्रण स्वीकार कर, जश्न का आनंद लेता है। परन्तु मलिक-काफूर व
हम्मीर-देव के सेनापति चामुण्डराय करणसिंह को उन दोनों की मित्रता बिलकुल
भी नहीं सुहाती और वे दोनों आपस में मिल जाते हैं और अपने-अपने राज्या-
ध्याक्षयों का अंत करके स्वयं राज्यों को हड़पने की नीयत से एक षड्यंत्र की
रचना करते हैं, जिसके अंतर्गत करणसिंह राज-भवन की दीवार के कमजोर हिस्से
का पता बताकर दीवार को ढाने की योजना बनाता है ताकि जब अलाउद्दीन और
हम्मीर-देव प्रभात बेला में उधर से गुजरें तो दीवार का एक बड़ा हिस्सा टूट कर
उन पर आ गिरे और दोनों लोग उससे दब कर मर जाएँ।
     इसी आशय से मलिक-काफूर अपने कुछ सिपाहियों को रोक कर शेष सेना
को दिल्ली वापस भेज देता है और तब करणसिंह व मलिक-काफूर सिपाहियों से
रात के अँधेरे में दीवार की बुनियाद को खोखला करवाते रहते हैं। प्रात:काल में
हम्मीर-देव सुलतान अलाउद्दीन, बेगम मेहरुन्निसा व गुलबदन को विदा करने के
लिए जब महल से बाहर निकलते हैं तो चामुंडराय करणसिंह और मलिक-काफूर
सेनिकों को उन पर दीवार ढाने का आदेश देते हैं।
     हम्मीर-देव की दृष्टि गिरती दीवार की ओर उठ जाती है और वे सुलतान
अलाउद्दीन से निकल भागने को कहते हैं। अलाउद्दीन उन्हें संकट की घड़ी में छोड़
कर जाने से इन्कार कर देता है तो हम्मीर-देव उसे एक जोर का धक्का देकर
गिरती हुयी दीवार से बाहर कर देते हैं और स्वयं अपने दोनों हाथों से दीवार को
रोकने कर असफल प्रयास करते हैं। बेगम मेहरुन्निसा तथा गुलबदन की डोलियाँ
खतरे से पहले ही बाहर निकल चुकी होती हैं। जब तक सिपाहियों की एक टुकड़ी
गिरती दीवार को रोकने वहां पहुँच पाती इससे पूर्व ही हम्मीर-देव दीवार से दब
जाते हैं और उनकी मृत्यु हो जाती है। सुलतान अलाउद्दीन हम्मीर-देव की मृत्यु
पर विलाप करने लगता है। विलाप सुनकर मेहरुन्निसा और गुलबदन भी
घटनास्थल पर आ जाती हैं और वे दोनों भी रोने लगती हैं।
      सुलतान अलाउद्दीन भारी हृदय से बेगम मेहरुन्निसा और पुत्री गुलबदन
के साथ दिल्ली को रवाना होता है। मलिक-काफूर अपने सेनिकों के साथ दिल्ली
पहले ही पहुँच चुका होता है। वह दिल्ली-सल्तनत के सभी मुल्ला-मौलवियों और
उलेमाओं को अलाउद्दीन के विरूद्ध भड़का देता है। हम्मीर-देव के साथ मित्रता
करने के कारण मुल्ला-मौलवी और उलेमाओं का वर्ग अलाउद्दीन को काफिर क़रार
देता है और उसे अपना सुलतान मानने से इनकार कर देता है।
     अत: जब सुलतान अलाउद्दीन अपनी बेगम और पुत्री सहित दिल्ली पहुँचता
है तो दिल्ली के सभी मार्ग बंद कर दिए जाते हैं और उसे नगर में नहीं घुसने
दिया जाता। मलिक-काफूर जो उस समय सेनाध्यक्ष के पद पर कार्य-रत है,
अलाउद्दीन को बंदी बना लेता है। और सुलतान के दोनों जवान पुत्रों खिज्रखाँ और
शादीखाँ को अंधा करवा देता है। सुलतान अलाउद्दीन की घटनास्थल पर ही मृत्यु
हो जाती है। मलिक-काफूर बेगम आलिया तथा गुलबदन को नज़र-बंद कर लेता
है। और सुलतान अलाउद्दीन के पांच वर्षीय पुत्र को सुलतान घोषित कर स्वयं
उसका संरक्षक (रीजेंट) बन जाता है।
      उधर दुर्गा, नूर और भीमा को जब ज्ञात होता है कि अलाउद्दीन एक बड़ी
सेना लेकर हम्मीर-देव पर चढ़ाई करने रण-थम्भौर आ पहुंचा है, तो वे लोग भील-
किरातों की एक लम्बी सेना लेकर अपने राजा की सहायता के लिए रण-थम्भौर
जा पहुँचते हैं, जहाँ उन्हें वास्तविकता का पता चलता है। और वे तुरंत अलाउद्दीन
की सहायता के लिए दिल्ली आ पहुँचते हैं जहाँ उन्हें सुलतान अलाउद्दीन का
जनाज़ा निकलता दिखाई देता है। दुर्गा को देखते ही मलिक-काफूर आपे से बाहर
हो जाता है और उसे गिरफ्तार करने का आदेश देता है। दुर्गा उससे कहती है
कि वह सुलतान अलाउद्दीन की मृत्यु पर उसे श्रद्धान्जलि देना चाहती है तब तक
के लिए उसे गिरफ्तार न किया जाए। मलिक-काफूर उसे जनाज़े में सम्मलित
होने की अनुमति दे देता है।
     इसके बाद अलाउद्दीन सेनिकों को उसे बंदी बनाने का हुक्म देता है। इधर
दुर्गा अपने धनुष पर वाण चढ़ाते हुए सेनिकों को खबरदार करती है। कोई भी
सेनिक उसे बंदी बनाने का साहस नहीं कर पाता। उसके साथ आयी भील-किरातों
की धनुर्धारी सेना यवन-सेना का सामना करती है। यवन-सेना के छक्के छूट जाते
हैं और वह परास्त होने लगती है। अपनी पराजय निश्चित जान कर मलिक-काफूर
उपस्थित मौलवियों से कहता है कि वे लोग कुरआन की वही आयत पढ़ें जिससे
कि दुर्गा निचेष्ट होकर उनकी गिरफ्त में आ जाए। तब एक मौलवी कुरआन की
एक आयत पढ़ कर दुर्गा के ऊपर फूंकता है। दुर्गा निचेष्ट हो यवन-सेनिकों की
गिरफ्त में आ जाती है।
     मलिक-काफूर इस पर ठहाके लगाता है और दुर्गा को ले जाकर लाल-महल
के एक गुप्त कमरे में बंद कर देता है साथ ही अपने सिपाहियों को आदेश देता है
कि वे हिन्दु-प्रजा के घरों से उनके सभी धार्मिक-ग्रंथों को बरामद करके लाल-महल
के आगे उनका ढेर लगा दें। ठीक दशहरे वाले दिन इस ढेर पर दुर्गा को बैठा कर
उसको जलाया जाएगा। ऐसा ही होता है। सारे वेद-पुराण, गीता-रामायण आदि ग्रंथों
का लाल-महल के आगे ढेर लगा दिया जाता है।
     नवरात्रि का समय है। दुर्गा अन्न-जल त्याग देती है और नौ दिन तक
देवी माँ के निर्जला व्रत रखती है। दशवें दिन मलिक-काफूर दुर्गा पर कोड़े बरसाता
हुआ घसीट कर धार्मिक-ग्रंथों के उस ढेर पर पटक देता है और सिपाहियों को उस
ढेर में आग लगाने का हुक्म देता है। उसके हुक्म की तामील की जाती है परन्तु
उन धार्मिक-ग्रंथों में आग नहीं लगती। नूरा जो अपनी सेना का संचालन कर रहा
होता है, सेनिकों के बीच से निकल कर बाहर आता है और मलिक-काफूर से कहता
है -"अरे कृष्णा, तुझे इतना भी मालूम नहीं, जिन्हें तू हिन्दुओं की मजहबी किताबें
समझ रहा है वो इस्लाम की पाक किताब 'कुरआन-ए-पाक' है। उठा के देख!" मलिक
काफूर ग्रंथों के उस ढेर से एक पुस्तक उठा कर पास खड़े एक मौलवी को थमाते
हुए उससे पढ़कर बताने के लिए कहता है। तब मौलवी उसे बताता है कि वह
पुस्तक सच-मुच ही कुरआन है। मलिक-काफूर क्रोध से चीखता है - "कौन है तू !
जादू करके सबकी आँखों में धूल झोक रहा है। मैं तेरी बातों में नहीं आने वाला।
ठहर जा, मैं तुझे अभी मजा चखाता हूँ।"
     मलिक-काफूर दुर्गा को छोड़ कर नूरा को मारने के लिए धर्म-ग्रंथों के ढेर से
कूद पड़ने को होता है तभी दुर्गा पलट कर उसकी वांह पकड़ लेती है और कहती
है - "जाता कहाँ है बहादुर सिपहसालार मालिक-काफूर ! क्या मुझे आग में नहीं
जलाएगा। अरे मूर्ख! मैंने तो कुरआन की मर्यादा को बचाने के लिए स्वयं को बंदी
बनवाया था जिससे लोगों का कुरआन पर विश्वास बना रहे। किन्तु तुझे मेरी बात
समझ में नहीं आई। यदि तू मेरी शक्ति देखना ही चाहता है तो ले देख!"  दुर्गा
अपने शरीर को फुलाती है और इतना फुलाती है कि उसके शरीर से लिपटी लोहे
की मोटी बेड़ियाँ टूट कर नीचे गिर पड़ती हैं। दुर्गा मलिक-काफूर के हाथों से
चाबुक छीन कर उसी पर बरसाने लगती है। एकत्र हिन्दू प्रजा-जन एक स्वर हो
'जय अम्बे'  'जय दुर्गे'  'जय भवानी'  की जय-जयकार कर उठते हैं। मलिक-काफूर
के तन पर बरसते प्रत्येक कोड़े के साथ वातावरण में चारों ओर (बैक-ग्राउंड से)
गीता के श्लोक गूंजने लगते हैं।
 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत: , अभियुत्थानं अधर्मस्य तदात्मानं
स्रजाम्यहम।
परित्राणाम साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम, धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि
युगे-युगे।'
     इसी-बीच मलिक-काफूर की दृष्टि दुर्गा की बांह की ओर उठ जाती है जो अभी
तक बाजू-बंद से ढकी थी किन्तु जब दुर्गा ने बेड़ियाँ तोड़ने के लिए अपना शरीर
फुलाया था तो बाजू-बंद के टूटकर गिर जाने से आवरण विहीन हो जाती है जिस
पर एक छोटा सा त्रिशूल उभरा हुआ दिखाई देता है, जिसे देखकर मलिक-काफूर
अपने अतीत की याद में खो जाता है। उसे सब-कुछ याद हो आता है कि मंदिर
में जब उसका पिता पुजारी रामदास उसका हाथ पकड़ कर खीच रहा था तो किस
प्रकार उसके हाथ का दहकता त्रिशूल छोटी बहिन की बांह से छू गया था और वह
जोरों से चीख उठी थी। सोचते-सोचते मलिक-काफूर बेहोश होकर गिर पड़ता है।
दुर्गा उसे बेहोश छोड़ कर अपने साथियों के साथ वहां से रण-थम्भौर की ओर चल
पड़ती है। जब मलिक-काफूर की चेतना वापस लौटती है तो वह दिखावे के लिए
अपने सेनिकों को डाटता है और रात होने की बेतावी से प्रतीक्षा करता है।
    रात्रि का समय है। दरवाजे पर किसी के हाथों की थपथपाहट सुनाई देती है।
बूढ़ा पुजारी रामदास दरवाजा खोल कर देखता है तो उसे रात के अँधेरे में हल्की
सी एक मानवाकृति दिखाई देती है। वह उसे पहचानने का प्रयास करता हुआ
पूछता है कि वह कौन है और क्या चाहता है। आगंतुक कुछ नहीं बोलता और
राम दास के पैर पकड़कर रोने लगता है। रामदास हैरान होकर उसे ध्यान से
देखता हुआ पुन: पूछता है कि वह कौन है और क्यों रो रहा है। तब मलिक-
काफूर उससे कहता है कि वह उसका बेटा कृष्णा है जो वर्षों पहले शिव-रात्रि के
दिन दिल्ली के शिव-मंदिर में उससे बिछुड़ गया था। पुजारी रामदास क्रोध से
कहता है कि उसका कोई बेटा नहीं है। उसका बेटा तो शिव-मंदिर में हुए रक्तपात
में मर  गया था। मलिक-काफूर रामदास को विश्वास दिलाता है कि वह मरा
नहीं था, वह जिन्दा है और उसके सामने खड़ा है।
     शोर-गुल सुनकर दुर्गा भी वहाँ आ जाती है और आश्चर्य से कभी अपने
पिता तो कभी मलिक-काफूर की ओर देखती है। बूढ़ा पुजारी बेटी से कहता है
कि सामने खड़ा व्यक्ति स्वयं को उसका बेटा बता रहा है। यह सुनकर दुर्गा उसे
खूब डाटती है और अपने पिता को बताती है कि वह सुलतान अलाउद्दीन खिलज़ी
का सिपहसालार मलिक-काफूर है। मलिक-काफूर दुर्गा को अपने हृदय से लगाकर
रोने लगता है और उससे क्षमा माँगता है। इसी बीच नूरा भी वहाँ आ पहुँचता है
और दुर्गा को बताता है कि मलिक-काफूर ही उसका सगा भाई कृष्णा है। नूरा
पुजारी रामदास से कहता है कि वह भी अब उसे क्षमा कर दे। रामदास कृष्णा
को उठाकर अपने हृदय से लगाकर खूब रोता है और उससे कहता है कि उसका
बूढ़ा पिता अपने बेटे की राह तकता हुआ अंधा हो चूका है। दोनों पिता-पुत्र
एक-दूसरे चिपट कर बहुत रोते हैं। पिता कहता है कि वह वचन दे अपने पिता
को छोड़ कर अब कभी नहीं जाएगा। कृष्णा नूरा से कहता है कि वह अब
अधिक देर नहीं ठहर सकता। उसे भगवान् शिव से भी क्षमा मांगनी है।
     कृष्णा अपने घोड़े पर सवार होकर तेजी से भाग निकलता है। दुर्गा, नूरा
और रामदास उसे रोकने का बहुत प्रयास करते हैं किन्तु वह रुकता नहीं है।
नूरा एक दूसरे घोड़े पर सवार होकर उसका पीछा करता है। मलिक-काफूर को
आता देख मुल्ला-मौलवी लोग दिल्ली गढ़ी के सारे द्वार बंद करवा देते हैं परन्तु
मलिक-काफूर और नूरा किसी प्रकार गढ़ी के अन्दर प्रविष्ट हो जाते हैं।
मलिक-काफूर (कृष्णा) की मंजिल है जामा मस्जिद के प्रांगण में गढ़ा शिव-लिंग
जिस पर कृष्णा उर्फ मलिक-काफूर नमाज पढ़ने आये मुसलमानों को पाँव पोंछ
कर नमाज पढ़ने को कहता था। वह भाग कर शिव-लिंग के पास आता है और
आज वह उसी शिव-लिंग पर फूट-फूट कर रोता है और अपनी भूल पर पश्चाताप
के आंसू बहाता है। मुल्ला-मौलवियो के आदेश पर सल्तनत के सेनिक उसे चारों
ओर से घेर लेते हैं। यह देख कर मलिक-काफूर तलवार म्यान से खीच कर उसे
हवा में लहराता हुआ सेनिकों को खबरदार करता है। कोई भी सेनिक उसके पास
जाने का साहस नहीं कर पाता है।
     तभी उसे क़ाज़ी बदरूद्दीन की आवाज सुनाई देती है -"मलिक-काफूर गौर से
सुनो ! तुम पर काफ़िर होने का इल्ज़ाम है। हमारे जासूसों ने इत्तला दी है कि तुम
दिल्ली सल्तनत की कट्टर दुश्मन दुर्गा के मुक़ाम पर गए और उससे चिपट कर
 रोये। उसके बूढ़े बाप के क़दमों में गिर कर भी रोये। हमें बताओ कि तुमने ऐसा
क्यों किया? क्या उससे तुम्हारा कोई पुराना रिश्ता है?" "रिश्तों की बात छोड़ो क़ाज़ी!
सज़ा बोलो!" मलिक-काफूर चीख उठता है। क़ाज़ी फिर कहता है -
"अपने ऊपर लगे काफ़िर होने के इल्ज़ाम को कबूल करते हो?" "नहीं ! काफ़िर मैं
तब था, जब मैं अपनी ही कौम के लोगों पर जुल्म कर रहा था ! काफिर मैं तब
था जब भगवान शिव की प्रतिमा पर लात-घूंसे बरसा रहा था ! काफिर मैं तब था
जब अपनी ही छोटी बहिन पर कोड़े बरसा रहा था ! और ...काफ़िर मैं तब था जब
मैं कृष्णा से काफूर बना ! आज तो मैं भगवान शिव से अपने अपराधों के लिए
क्षमा मांग रहा हूँ, फिर मैं काफ़िर कैसे हो गया।"  मलिक-काफूर मुंह से अंगारे
उगलता हुआ चीखता है।
     क़ाज़ी बदरूद्दीन आगे कहता है - "मलिक, तुम्हारे कबूल न करने से उलेमाओं
का फ़ैसला नहीं बदल सकता! तुम्हें सरिअत के मुताबिक़ सजा-ए-मौत भी दी जा
सकती है! अगर तुम 'जमाते-इस्लाम' के आगे सर झुका कर माफ़ी मांग लो तो
तुम्हारी सज़ा कुछ कम भी हो सकती है।" क़ाज़ी बदरूद्दीन की बात पर मलिक-
काफूर जोरों से हँसता है और कहता है - "क़ाज़ी! यह सिर तो अब केवल मेरे
भगवान शिव के आगे ही झुकेगा।" "तो फिर मौत के लिए तैयार हो जाओ!
सिपाहियों इसे गिरफ्तार करके फांसी पर लटका दो!" सिपाही मलिक-काफूर की
ओर बढ़ते हैं तभी वह चीख कर कहता है -"सिपाहियों वहीँ ठहर जाओ !
क़ाज़ी बदरुद्दीन! मरने वाले से उसकी आखिरी ख्वाइस पूछने की क्या सरिअत
इजाज़त नहीं देती ?"
"बोलो, क्या है तुम्हारी आखिरी ख्वाइस?"
"मेरी ख्वाइस है कि मरने से पहले मुझे एक बाल्टी पानी दिया जाए।"
मलिक-काफूर को उसकी इच्छा के मुताबिक़ एक बाल्टी पानी दे दिया जाता है
जिससे वह शिव-लिंग खूब अच्छी तरह से धोता है और स्वयं पर भी जल के
छींटे मारकर 'हर-हर महादेव' का उच्चारण करते हुए तलवार से अपने सिर की
भेंट भगवान शिव को अर्पित कर देता है।
     कहानी यहीं ख़त्म नहीं होती। कहानी के पात्र बदलते रहे, उनके नाम
बदलते रहे किन्तु यवन-शासकों द्वारा हिन्दुओं पर अत्याचार किये जाने का
और हिन्दू देवी-देवताओं के मंदिरों की तोड़-फोड़ करने का सिलसिला यों ही जारी
रहा। दिल्ली सल्तनत पर कई सुलतानों ने हुकूमत की और चले गए।
सल्तनत का ज़माना गया तो मुग़ल बादशाहों का समय आया। 1२०६ ई०
से १७०६ ई० तक यवनों ने निष्कंटक राज्य किया। एक से बढ़ कर एक बर्बर
शासक आये और हिन्दुओं के लहू से धरती को लाल करके चले गए।
फिर आये अंग्रेज, जिन्होंने लग-भग दो सौ साल तक भारत पर शासन किया।
उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम दोनों में फूट डाल कर 'फूट डालो-राज करो' की कहावत को
चरितार्थ किया।
    अंग्रेज भारत से चले तो गए किन्तु जाते-जाते वे साम्प्रदायिकता के बीज बो
गए जिनकी बोयी फसल हम भारत वासी आज तक काट रहे हैं। साम्प्रदायिकता
आज भी हमारे देश में किसी न किसी रूप में पनप रही है जो समय-समय पर
ज्वालामुखी की भांति फट कर सामने आ जाती है। आज के मुस्लिम देशों का
'जिहाद' भी कुछ ऐसा ही है जैसा इस उपन्यास में वर्णित किया गया है न कि
गीता और कुरआन में वर्णित जिहाद जैसा।

Thursday, March 20, 2014

होली में हुड़दंग!!!

आज के समय में सभी वर्ण के हिन्दू होली का उत्सव मनाते है, होली का नाम आते ही मस्तिष्क में आज के समय में जो प्रथम चित्र उभरता है वो  हुड़दंग का , टोलियां बना के रंगो -कीचड़ आदि से खेलने का , नशा किये हुए लोग , स्त्रियों के साथ  बदतमीजी करते लोग , लड़ाई झगड़ा करते हुए लोग ।

पर ऐसा भी नहीं कि सभी लोग ऐसा करते हैं कुछ लोग शांति पूर्वक भी होली मानते हैं , बेशक  संख्या  कम होती है । परन्तु जैसा भी माहौल में यदि कोई गौर करे तो जो सवर्ण बुजुर्ग होते हैं वो होली खेलना पसंद नहीं करते , अगर बहुत ज्यादा दबाब दिया जाये तो माथे पर गुलाल का टीका भर लगवा लेते हैं । आपको  यदि शोले फ़िल्म का वो दृश्य याद हो जिसमे ठाकुर ( संजीव कुमार) जया बहादुड़ी के घर जाता है तो रास्ते में जया बहादुड़ी उसे बताती है कि उसके पिता जो कि ठाकुर हैं वो केवल मिलने वालो से टीका ही लगवाते हैं होली नहीं खेलते ।
ऐसा क्यों , इसका जबाब है कि होली सवर्णो का नहीं अपितु शुद्रो का पर्व है । ऐसा शास्त्रो में लिखा है ,दंपति चतुर्थी नामक ग्रन्थ में चारो वर्णो के अनुसार उनके पर्व निश्चित किये गए हैं - श्रावणी उपकर्म( रक्षा बंधन) ब्राह्मण पर्व , विजय दशमी क्षत्रिय पर्व है , दीपावली वैश्य पर्व और होली शुद्र पर्व है ।

शुरू में यह पर्व मौसमी पर्व था जिसमे फसल कटने पर उत्साह के कारण इसको मनाया जाता था क्यों कि नया अन्न कट के घर आता था इसलिए इसे "नवान्नेष्टि " कहा जाता था । अन्नो से बने पकवानो को अपने इष्ट देवता को लोग अर्पित करते थे , इसके लिए भुने हुए जौ का भी खूब प्रयोग होता था इसलिए इसको "होलक "  भी कहा जाता था ।

परन्तु पौराणिकों ने इस  "होलक " पर्व को "होली " बना के एक हुड़दंगी और अश्लील पर्व बना दिया गया ,  इसकी कथा भविष्य पुराण में कही गयी   है - युधिष्टर कृष्ण से प्रश्न करता है कि फाल्गुन कि पूर्णिमा को यह कौन सा उत्सव मनाया जाता है ?  इसपर कृष्ण कहते हैं कि सत्ययुग में एक राजा थे जिनका नाम रघु था उनके राज्य में ढूंढा नाम कि एक राक्षसी ने बहुत आतंक मचा दिया था जिसके चलते उन्होंने नारद से इससे बचने का उपाय पूछा । नारद ने उपाय बताया कि आज फाल्गुन कि पूर्णिमा है और शरद ऋतू समाप्त हो गयी है , यदि राज्य के बच्चे लकड़ी कि तलवार लेके , प्रश्नता पूर्वक सुखी लकड़िया एकत्रित करे और विधिपूर्वक अग्नि जला के उसकी परिक्रमा करे और हँसे , गए , जिसके मुंह में जो आये वो बोले , गलियां दें तो वो राक्षसी भाग जायेगी ।
दक्षिणा मिले इसके लिए इसे पूजने का आदेश भी दिया गया ।

पौराणिकों आदेश के कारण कालांतर में इस पर्व का  स्वरुप हुड़दंग और अश्लिता में परिवर्तित हो गया , और शायद  इसी कारण इसे "शुद्रो"का पर्व कह दिया गया ।
तो सोचने कि बात है कि ' नवान्नेष्टि" को "होली" में परिवर्तित कर के लोगो को हुड़दंगी बनाने का दोष किसका है?